अधिवक्ता परिवार पर हमला, सेना के जवान को पीटा — पीड़ित पर ही कार्रवाई, अब विवेचक पर गंभीर आरोप

बस्ती ( मुंडेरवा थाना क्षेत्र / रामपुर चौकी)
जनपद बस्ती के मुंडरवा थाना क्षेत्र अंतर्गत रामपुर चौकी का एक मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, जहां देश की सेवा में तैनात एक सैनिक और अधिवक्ता परिवार पर जानलेवा हमला किए जाने का आरोप है। हैरानी की बात यह है कि पीड़ित पक्ष पर ही पुलिस ने कार्रवाई कर दी, जिसके बाद अब विवेचक पर मुकदमे को प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।


👉 क्या है पूरा मामला?
पीड़ित अम्बिका प्रसाद दूबे के अनुसार 16 मार्च 2026 को उनके पुराने घर पर चौथ कार्यक्रम चल रहा था। उसी दौरान शाम करीब 6 बजे सर्वेश चन्द्र सहित कई लोग उनके नए मकान में घुस आए और अम्बिका प्रसाद दूबे व उनके भाई जगदम्बिका प्रसाद दूबे पर हमला कर दिया।
बताया जा रहा है कि जगदम्बिका प्रसाद दूबे भारतीय सेना में तैनात जवान हैं और छुट्टी पर घर आए थे। दोनों को बुरी तरह पीटा गया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए।
👉 पुलिस पर पक्षपात का आरोप
घटना की सूचना डायल 112 समेत प्रशासनिक अधिकारियों को दी गई, लेकिन आरोप है कि पुलिस पहले आरोपियों के घर पहुंची और बाद में पीड़ितों के पास।
सबसे बड़ा आरोप यह है कि अगले ही दिन बिना निष्पक्ष जांच के पुलिस ने पीड़ित अम्बिका प्रसाद दूबे पर ही एकतरफा कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज कर चालान कर दिया।
👉 निर्दोषों के नाम जोड़ने का आरोप, पीड़ित पक्ष का कहना है कि गौरव, हिमांशु और राजकुमार के नाम भी मुकदमे में जोड़ दिए गए, जबकि वे घटना स्थल पर मौजूद ही नहीं थे। इसका साक्ष्य सीसीटीवी फुटेज में होने का दावा किया गया है।
👉 मेडिकल प्रक्रिया पर भी सवाल, घायलों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से सीधे जिला अस्पताल भेजने के बजाय उपजिलाधिकारी के सामने प्रस्तुत किया गया।
इसके अलावा, एक्स-रे और मेडिकल प्रक्रिया में देरी और अनियमितता के भी आरोप लगाए गए हैं, जिससे पूरे मामले की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
👉 एसपी के हस्तक्षेप के बाद दर्ज हुआ मुकदमा ,बताया जा रहा है कि पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप के बाद 27 मार्च 2026 को आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो सका।
गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद सेना के जवान जगदम्बिका प्रसाद दूबे को घायल हाथ के साथ ही ड्यूटी पर लौटना पड़ा, और वर्तमान में वे असम में तैनात हैं।

पीड़ित पक्ष का आरोप है कि घटना के करीब 20 दिन बाद मेडिकल रेफर की प्रक्रिया की गई, जिससे यह संदेह गहराता है कि विवेचक ने मामले को प्रभावित करने की कोशिश की है।

क्या एक सैनिक और अधिवक्ता परिवार को भी न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
क्या जांच निष्पक्ष है या किसी दबाव में प्रभावित हो रही है?
आखिर विवेचना की दिशा पर लगातार सवाल क्यों उठ रहे हैं?

यह मामला सिर्फ एक हमले का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था और पुलिस की निष्पक्षता पर उठते गंभीर सवालों का प्रतीक बनता जा रहा है। पीड़ित पक्ष ने पुलिस अधीक्षक को पत्र देकर उच्च स्तरीय जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की है।

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