संत कबीर नगर, 17 अप्रैल 2025,
ग्राम पंचायतों होने जा रहे सोशल ऑडिट की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सोशल ऑडिट के दौरान पारदर्शिता की कमी है, और पत्रकारों को जानबूझकर स्थलीय निरीक्षण से दूर रखा जा रहा है। “पत्रकारों की भूमिका और उनकी अनुपस्थिति नहीं होनी चाहिए” क्योंकि इससे सामाजिक योजनाओं की निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित करने में पत्रकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। हालांकि, वर्तमान में भी सोशल ऑडिट के दौरान पत्रकारों को आमंत्रित नहीं किया जा रहा है, कुछ पत्रकार बंधुओ के रसूख के चलते उनके परिवार के किसी सदस्य को या उनको दिखावा नाम पर टीम में शामिल कर लिया जाता है। जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं। कई पत्रकारों का कहना है कि उन्हें या तो सूचना नहीं दी जाती, या फिर उन्हें ऐसे समय पर पहुंचते है जब निरीक्षण पहले ही समाप्त हो चुका होता है ऐसा होता है कुछ पत्रकारों से गठ जोड़ के कारण जिससे सही सूचना प्राप्त नहीं हो पाती। कुछ पत्रकारों का दावा है कि सोशल ऑडिट टीमों और स्थानीय अधिकारियों के बीच मिलीभगत है, जिससे केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। सोशल ऑडिट का उद्देश्य सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है। लेकिन जब पत्रकारों और आम जनता को इस प्रक्रिया से दूर रखा जाता है तो यह उद्देश्य अधूरा रह जाता है , कुछ साथ गांठ करने वाले पत्रकारों की बात नहीं लिख रहा मैं समस्त पत्रकारों की वेदना लिख रहा हूं इससे न केवल योजनाओं की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है बल्कि भ्रष्टाचार और अनियमिताओ को भी बढ़ावा मिलता है। सोशल ऑडिट के दौरान ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिससे सभी पत्रकारों को यह पता लग सके की किस जगह सोशल ऑडिट चल रही है एवं स्थलीय निरीक्षण हो चल रहा है, सोशल ऑडिट की तिथियां को सार्वजनिक रूप से साझा करनी चाहिए स्थानीय नागरिकों सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को मिलकर निगरानी सीमित बनाई जानी चाहिए। सोशल ऑडिट टीमों की पारदर्शिता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब टीम को पहले से ही प्रशिक्षण दिया जाए सोशल ऑडिट की प्रक्रिया का उद्देश्य जवाबदेही सुनिश्चित करना है लेकिन दुर्भाग्य है इस देश का कि पत्रकार एवं आम जनता को इससे दूर कर दिया जाता है सिर्फ दिखावा मात्र के लिए कागज में कोरम पुरा किया जा रहे हैं कौन देखने वाला है। अधिकारीगण कम ही अवसर पर चेक करने आते बाकी सूचनाएं उनको पत्रकारों के माध्यम से प्राप्त होती हैं, लेकिन पत्रकारों को भी बड़े कठिनाई का सामना करना पड़ता है खुली बैठक के दिन। पारदर्शिता एवं जवाब देही बनाए रखने के लिए जहां ऑडिट हो उसे ग्राम सभा की जानकारी को सार्वजनिक किया जाए नहीं तो सोशल ऑडिट का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा, और यह सिर्फ खाना पूर्ति ही रह जाएगी धरातल पर काम दिखाई नहीं देंगे क्योंकि दिखाने वाले पत्रकार सिर्फ खुली बैठक के दिन ही पहुंचते हैं वह भी बिना बुलाए, उस दिन प्रधान जी लोग जैसा व्यवहार पत्रकारों के साथ करते हैं उसको सारे पत्रकार बंधु अच्छी तरह समझते होंगे अब ऐसा क्यों होता है यह एक सोचनीय प्रश्न है ?
