संत कबीर नगर 05 जुलाई 2025,
कश्मीर घाटी का इतिहास सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पलायन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलगाववादी उग्रवाद और धार्मिक कट्टरता की आग में कई अन्य जातियों और समुदायों को भी जला डाला गया। देश के बंटवारे के बाद से लेकर विशेषकर 1989-90 के उग्रवाद के चरम दौर में घाटी से न केवल कश्मीरी पंडित बल्कि सिख, दलित, शिल्पकार, व्यापारी और अन्य गैर-मुस्लिम समुदायों को भी जान बचाकर पलायन करना पड़ा। अलगाववादियों द्वारा ‘रालिव, चालिव या गालिव’ (धर्म बदलो, भाग जाओ या मरो) जैसे कट्टर नारे पूरे कश्मीर में गूंजने लगे थे। मस्जिदों से धमकी भरे एलान और स्थानीय अखबारों में धमकी भरे पोस्टर आम हो चुके थे। उस समय घाटी में ‘इस्लामी शासन’ स्थापित करने की सुनियोजित साजिश के तहत गैर-मुस्लिमों को आतंकित कर बाहर निकालने का क्रम शुरू हुआ। कश्मीरी पंडितों के साथ-साथ घाटी में वर्षों से रह रहे सिख परिवारों को भी धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ा। 2000 में छत्तीसिंहपोरा नरसंहार में 35 सिखों की नृशंस हत्या इसका जीवंत उदाहरण है। दलित समुदाय, सफाई कर्मचारी, बंजारा, शिल्पकार, महाजन, सूद जैसे व्यापारिक और सेवाभावी जातियां भी उस भय के माहौल में घर छोड़ने को मजबूर हुईं। इन सब के बीच में ना तो प्रशासन ने कोई कारगर उठाया नहीं तत्कालीन सरकारें इस पलायन को रोक पाई। आज 10 को बाद भी यह समुदाय न्याय और पुनर्वास की बाट जोह हो रहा है। यह न केवल धार्मिक उत्पीड़न का विषय है बल्कि यह भारत के लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने पर गहरी प्रहार की कहानी भी है।
