फेसबुक या फूहड़बुक? डिजिटल अश्लीलता का बढ़ता आतंक और समाज की गिरती संवेदनशीलता, प्रियंका सौरभ__________

संत कबीर नगर 28 मई 2025,
जब सोशल मीडिया हमारे जीवन में आया तो उम्मीद थी कि यह समाज को जोड़ने और संवाद को मजबूत करने और जन जागरुकता को फैलाने का एक सशक्त माध्यम बनेगा, लेकिन आज 2025 में विशेषकर इस फेसबुक मंच पर जिस तरह अश्लीलता और फूहड़ता का आतंक फैलता जा रहा है, यह न केवल चिंताजनक है बल्कि सभ्यता की चादर में लिपटे हमारे समाज की मानस पतनशीलता को भी उजागर करता है। आज फेसबुक पर एक महिला या किसी व्यक्ति की निजता से खिलवाड़ करती हुई अश्लील वीडियो अगर गलती से अपलोड हो जाती है तो उसके रिपोर्ट और हटाने से पहले ही लाखों लोग उसे डाउनलोड, साझा और एक दूसरे से मांग लेते हैं। यह सिलसिला इतना भयावह और संगठित रूप में होता है कि लगता है जैसे सभ्यता समाज नहीं, किसी डिजिटल भेड़िया झुंड में रह रहे हों। सबसे अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि यह सब पढ़े लिखे, संस्कारी दिखने वाले, प्रोफाइल पर तिरंगा, ऊँ या गीता का श्लोक डालने वाले लोग ही सबसे ज्यादा करते हैं। फिर सवाल उठता है कि यही हमारी वास्तविक मानसिकता है? क्या हम दोहरे चरित्र वाले समाज के प्रतिनिधि है? जो मंच पर नैतिकता की बात करता है और अकेले में अश्लीलता का उपभोग करता है।
इन वीडियो को रिपोर्ट करना, विरोध करना और हटवाना तो दूर की बात, लोग इन्हें चुपचाप देखते हैं और सहेजते हैं, और निजी संदेशों में साझा करते हैं। जो कृत्य समाज में निंदा के योग्य होना चाहिए, वह मनोरंजन और मोबाइल संदेशों का एक हिस्सा बन जाता है। ऐसे में समाज केवल अपराधी का साथ नहीं देता, बल्कि वह खुद अपराध का भागीदार बन जाता है। हर बार कोई महिला किसी वीडियो में जबरन और धोखे से दिखा दी जाती है तो समाज उसे कोसने लगता है। जबकि असली दोषी नहीं होता है जिसने उसका वीडियो बनाया, और वे लोग होते हैं जो उसे साझा करते हैं। वास्तव में तो वह शर्म उस समाज को आनी चाहिए जो दूसरों की पीड़ा को “क्लिक बेट” और पीड़ा समझते हैं।
फेसबुक दावा करता है कि उसके पास सामुदायिक मानक है। जो नफरत फैलाने, अश्लीलता परोसने और हिंसा भड़काने सामग्री को रोकने हैं। लेकिन इसकी हकीकत ठीक उसके उलट हैं। अगर कोई उपयोगकर्ता कोई राजनीतिक सच्चाई या तीखी भाषा पर लिख दे तो उसकी पहचान कुछ मिनट में अवरुद्ध हो जाती है। बल्कि वही मंच घंटो तक अश्लील वीडियो वायरल होते देखने देता है, बिना किसी हस्तक्षेप के।
क्या यह मान लिया जाए कि फेसबुक की नीति यही है। ” अगर आप सत्य बोलेंगे तो आप खतरनाक हैं और अगर आप अश्लीलता फैलाएंगे तो आप व्यस्त और उपयोगी उपभोक्ता हैं। हमें समझना होगा कि सोशल मीडिया केवल एक तकनीकी मंच न नहीं है, यह अब जनमानस को प्रभावित करने वाला एक सामाजिक ढांचा बन चुका है,और हर ढांचे की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं। जब हम स्वयं ऐसे सामग्री को देख रहे हैं, साझा कर रहे हैं या मौन हैं, तो हम अपराध में साझीदार बन जाते हैं। हमारे बच्चों, बहनों, पत्नियों और समाज की महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून से नहीं होगी। बल्कि हमारी मानसिकता से होगी। अगर हम वही मानसिकता पालें जो अपराधियों की होती है- दूसरों की निजता को झांकना, उन्हें वस्तु समझना, उन्हें मानवता से गिराना, तो हम भी किसी दोषी से कम नहीं हैं।
डिजिटल नैतिक शिक्षा का उपयोग विद्यालयों, महाविद्यालयों और नौकरी प्रशिक्षण केन्द्रों पर डिजिटल आचार संहिता पर विशेष ध्यान होना चाहिए। अश्लीलता वाले वीडियो को साझा करने वाले लोगों के ऊपर सख्त साइबर कानून लागू हो और समय पर कार्रवाई हो। फेसबुक जैसी कंपनियों को भारत सरकार के अधीन विशेष निगरानी प्रकोष्ठ में जबाबदेह बनाया जाय। जन जागरूकता अभियान, स्वयंसेवी संस्थाओं, लेखकों, पत्रकारों और जागरूक नागरिकों को मिलकर डिजिटल सुचिता पर अभियान चलाने चाहिए।सभ्यता केवल तन से नहीं बल्कि मन से होती है। शब्दों से नहीं बल्कि कर्मों से होती है। अगर हम समाज में अपने बहनों की पीड़ाओं में लज्जा ढूढने लगें तो यह गिरावट नहीं बल्कि मानवता की हत्या है।

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