सियार के वेश में सिंह: चापलूसी के युग में ईमानदारी की गिरती साख और ढोंगी प्रवृत्तियों का बढ़ता वर्चस्व

संत कबीर नगर 18 अगस्त 2025,
समाज में आज सबसे बड़ा संकट सत्य और असत्य के बीच अंतर पहचानने का है। धोखेबाज, स्वार्थी और छल-कपट से परिपूर्ण व्यक्ति आज समाज के सम्मानित वर्ग में शामिल हो जाते हैं, जबकि सच्चे और ईमानदार लोग उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। ये अवसरवादी लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए विनम्रता, ज्ञान और सेवा का ऐसा मुखौटा पहनते हैं कि लोग उन्हें संत, सहनशील, दूरदर्शी और समाज सुधारक समझ बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति सामने से जितने भोले और विनम्र दिखते हैं, भीतर से उतने ही चालाक और योजनाबद्ध होते हैं। ये लोग दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं और जब उनका काम निकल जाता है, तो उस कंधे को पहचानने से भी इनकार कर देते हैं। मूर्ख बनाने की कला में ये इतने पारंगत होते हैं कि उनके शब्दों और व्यवहार में लोग परम श्रद्धा तक रखने लगते हैं। जब समाज को उनकी असलियत समझ में आती है, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी सियार ने सिंह का वेश धारण कर लिया हो, और लंबे समय तक सब उसे सिंह समझते रहे। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज का समाज दिखावे और प्रदर्शन की भाषा अधिक समझता है। सत्य, समर्पण और त्याग की बातों को आदर्श तो मानता है, पर जीवन में जगह नहीं देता। वर्तमान दौर में चापलूसों की भरमार है जो स्वार्थी लोगों को “द्वितीय विवेकानंद” “समाज के मार्गदर्शक” या “दुर्लभ संत” जैसे अलंकरणों से नमाज आते हैं। यह जादू कर उनकी झूठी छवि को बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं क्योंकि उन्हें भी अपने हिस्से की रोटियां सीखनी होती है। इन धोनियों की बातें सुनने में बड़ा आदर्शवादी लगते हैं। लेकिन उनके कर्म इसके ठीक विपरीत होते हैं। आज का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि ईमानदारी, सच्चाई, परिश्रम और समर्पण को कमजोरी समझ जाने लगा। जबकि स्वार्थ, दिखावा और छल को सफलता की सीधी मान लिया गया। चापलूसों का यह दौरा हार उसे व्यक्ति के पीछे कर रहा जो आत्मा बल, नैतिकता और चरित्र की नींव पर जीवन जीना चाहता है। ऐसे समय में जरूरी है कि हम अपने विवेक और अत:करण की आवाज को सुने जो व्यक्ति सच्चा है वह भले ही समझ में चुप है लेकिन उसकी आत्मा शांत और गौरवपूर्ण होती है। उसका चरित्र समय के साथ चमकता है जबकि झूठी छवियां एक न एक दिन ढह जाती है। इतिहास गवाह है कि सत्य की उम्र थोड़ी होती है पर सत्य शाश्वत होता है। समाज के लोगों को चाहिए कि वह सताई चक्र चौथ से परे जाकर चरित्र को परखें। कोई व्यक्ति कितना भी मीठा बोले यदि उसके कम दूसरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं तो वह ईश्वर का भक्त नहीं सिर्फ अवसर वादी है। जो अपने स्वार्थ के लिए निति और धर्म की बात करता है वह मार्गदर्शन नहीं मार्ग भ्रष्ट है। आज के समाज की जरूरत है ऐसे लोगों की पहचान करने की जो सियार की तरह भेष बदलकर सिंह बनने का अभिनय कर रहे हैं। ढोंग से दूरी और ईमानदारी से नाता जोड़ना ही समाज को बचा सकता है। चापलूसी के इस युग में सत्य बोलना क्रांति है और ईमानदार व्यक्ति आज भी सबसे भारी है बस जरूरत है उसे पहचान और उसके साथ खड़े होने की अन्यथा मिट्ठूबोलवा खतरनाक लोगों से दुनिया भारी पड़ी है।

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