विलुप्त होते संस्कार और संस्कृति: मोबाइल युग में गुम होती भारतीय पीढ़ी की पहचान

20 दिसंबर 2025,
आधुनिक युग तकनीक का युग है, परंतु यह विकास हमारे संस्कारों, संस्कृति और सामाजिक संरचना को धीरे-धीरे निगलता जा रहा है। भारतीय समाज, जो अपनी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों के लिए विश्वविख्यात था, आज पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में अपनी पहचान खोता जा रहा है। यह केवल सांस्कृतिक चिंता नहीं है, यह राष्ट्रीय चेतना और भविष्य की दिशा का सवाल है। आज मोबाइल ने युवा वर्ग को अपने शिकंजे में ऐसा कसा है कि पढ़ाई, खेलकूद, सामाजिकता सब पीछे छूट गई हैं। जहां कभी युवाओं की सुबह व्यायाम, योग और संयम से होती थी,आज वह देर रात तक मोबाइल गेम्स, सोशल मीडिया और व्यर्थ की सामग्री में उलझे रहते हैं। शारीरिक श्रम, ग्रामीण खेल, पारिवारिक मूल्यों की बातें अब पिछड़ेपन की निशानी समझी जाने लगी हैं। परिणामस्वरूप मानसिक अवसाद, शारीरिक दुर्बलता और नैतिक पतन बढ़ रहा है। हम यह नहीं कह सकते कि पश्चिमी सभ्यता में सब कुछ गलत है, लेकिन उसका अंधानुकरण कर हम अपनी जड़ों को काट रहे हैं। परिधान से लेकर आहार-विहार तक, अब भारतीयता कहीं दिखाई नहीं देती। संस्कार, मर्यादा, गुरु-शिष्य परंपरा, बड़ों का सम्मान ये सब बातें अब किताबों में सिमट गई हैं। सरकार को केवल डिजिटल इंडिया के प्रचार तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अब समय है कि “संस्कार युक्त डिजिटल इंडिया” की परिकल्पना की जाए। इसके लिए सरकार को कुछ आवश्यक कदम उठाना चाहिए जैसे विद्यालयों में अनिवार्य संस्कृतिक शिक्षा हो। योग, ध्यान और नैतिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग पर समय सीमा के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाए। डिजिटल डिटॉक्स कैंपेन की शुरुआत हो,खासकर स्कूल, कॉलेज स्तर पर। स्वदेशी खेल, संगीत, नृत्य और साहित्य को प्रोत्साहित किया जाए। समाज विशेष रूप से माता-पिता और शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को केवल आधुनिकता की ओर नाद ढकेलें, बल्कि उन्हें अपने मूल्यों और परंपराओं से भी जोड़ें, गांव देहात में होने वाले पारंपरिक त्योहार, मेले, कीर्तन, संस्कार शिक्षाएं बच्चों को आकर्षित करने के नए तरीके से पुनः जीवित किया जाए। अगर समय रहते सरकार एवं आम जनमानस ने नहीं चेता तो इसका भयानक दंड आने वाली पीढ़ियां को मिलेगा इसके दोषी बुजुर्ग ही होंगे क्योंकि इससे आने वाली पीढ़ी शब्दों में भारतीय होगी पर सच में पूर्णतया विदेशी। संस्कार, संस्कृति और श्रम को छोड़कर कोई भी राष्ट्र महान नहीं बन सकता, ऐसे में आधुनिक युवा वर्ग को यह तय करना है कि विकास की दौड़ में अपनी आत्मा को देंगे या आत्मा को साथ लेकर ही विकास करेंगे।

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