एकता की नींव: परिवार से राष्ट्र तक टूटते संबंधों और बिखरते समाज की पीड़ा– राघवेंद्र त्रिपाठी

संत कबीर नगर 06 अगस्त 2025
आज का समाज विघटन के दौर से गुजर रहा है। विडंबना यह है कि जहां एक ओर हम चंद्रयान और डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार, समाज और देश की आंतरिक एकता छिन्न-भिन्न होती जा रही है। यह विघटन केवल सामाजिक या राजनैतिक नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आत्मिक स्तर पर भी गहराता जा रहा है। सबसे पहले बात करें परिवार की, जो समाज की पहली इकाई है। एक ही घर में पले-बढ़े भाई जब संपत्ति, अहम और बाहरी हस्तक्षेप के कारण बंट जाते हैं, तो केवल दीवारें नहीं खड़ी होतीं, रिश्तों के बीच विश्वास की नींव भी ढह जाती है। आजकल देखा जा रहा है कि विवाह के बाद परिवारों में नवविवाहित महिलाओं के माध्यम से आंतरिक खींचतान इतनी बढ़ जाती है कि भाई-भाई में संवाद तक समाप्त हो जाता है। यह केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि समाज में विघटन का बीज है। बेरोजगारी, प्रतिभा की उपेक्षा, और आर्थिक असमानता आज की प्रमुख समस्याएं हैं। जब एक योग्य युवक केवल इसलिए घर में तिरस्कार झेलता है क्योंकि उसके पास नौकरी नहीं है, तो वह धीरे-धीरे डिप्रेशन में जाने लगता है। उसके स्वाभिमान को घर में ही कुचल दिया जाता है। यह स्थिति देश की सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। राजनीति की स्वार्थपरकता से इस स्थिति को और भयावह बना दिया है। एक अनपढ़ व्यक्ति यदि तीन बार विधायक बना तो उसे तीन पेंशन मिलती है जबकि 35 वर्षों तक राष्ट्र निर्माण में सेवा देने वाले कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था खत्म कर दी जाती है यह न केवल अन्याय है बल्कि समाज में असंतोष का कारण भी बनता है। राजनीतिक खड्यंत्र जातिवाद धर्म के नाम पर विभाजन और वर्चस्व की लड़ाई ने समाज की जड़ों को खोखरा कर दिया है। गरीब और मध्यम वर्गीय नागरिक सबसे ज्यादा शिकार होता है जो “देश के अंदर से टूटा हो वह बाहर से कैसे सशक्त हो सकता है”। इस संकट से उबर के लिए सबसे पहले परिवार में संवाद, आपसी एकता और सहभागिता की भावना को पुनर्जीवित करना होगा। परिवारों में महिलाओं की भूमिका निर्णायक होती है उन्हें जोड़ने का कार्य करना चाहिए तोड़ने का नहीं। शिक्षा प्रणाली को रोजगार परख और नैतिक बनाना होगा। प्रतिभा को जाति, क्षेत्र और सिफारिश से नहीं योग्यता से मान्यता देनी होगी। राजनीति को सेवा का माध्यम बनाना होगा ना कि केवल सत्ता और संपत्ति का। पेंशन, रोजगार, सामाजिक न्याय इन सब पर पुनर्विचार होना अत्यंत आवश्यक है।

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