स्वार्थ के रंग में रंगा इंसान: गिरगिट की चाल, धर्म का ढोंग और मानवता का क्षरण

संत कबीर नगर
वर्तमान समय में जब घोर कलियुग अपने चरम पर है, तो व्यक्ति का सबसे बड़ा धर्म पैसा और स्वार्थ बन गया है। यह वह युग है जहाँ मनुष्य की पहचान उसके मूल्यों, आचरण और नैतिकता से नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति, दिखावे और चतुराई से होती है। आज समाज में ऐसे लोगों की भरमार हो गई है जो धर्म और सेवा का चोला पहनकर, भीतर से सिर्फ स्वार्थ साधने का काम करते हैं। यह स्थिति न केवल सामाजिक ढांचे को खोखला कर रही है, बल्कि मानवता को भी धीरे-धीरे निगल रही है। ऐसे व्यक्ति जब तक किसी से काम लेना हो, तब तक विनम्रता की सारी सीमाएं लांघ जाते हैं। उनकी भाषा, व्यवहार, चाल-चलन सब कुछ गिरगिट की तरह रंग बदलता है। बातों में संस्कार और चेहरे पर सात्विकता का मुखौटा लगाकर वह समाज को यह विश्वास दिलाते हैं कि वे सच्चे धर्मपरायण और विद्वान हैं। लेकिन जैसे ही उनका स्वार्थ सिद्ध होता है, उसी व्यक्ति के लिए जिसने उन्हें सहारा दिया, वही निंदा और उपेक्षा के पात्र बन जाते हैं। आज अनेक लोग धर्म नीति और नैतिकता का भाषण देने में तो निपुण होते हैं लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन में उनका कोई प्रतिबिंब नहीं मिलता। वे दूसरों को उपदेश देने में आगे रहते हैं जबकि खुद पर जिम्मेदारी आती है तो छूमंतर हो जाते हैं या उसे अपने निजी स्वास्थ्य के रूप में मोड़ देते हैं। ऐसे लोग समाज में भरम फ्लेट हैं और सच्चे कर्म योगो की पहचान धुंधली कर देते हैं। स्वार्थी लोगों का एक बड़ा लक्षण यह भी है कि वह सामान्य बातचीत में भी दूरी बना लेते हैं। कम बोलना, गंभीरता का ढोंग, विचारशीलता का मुखौटा, ओड करवे अपने अहंकार को “शांत प्रवृत्ति” का रूप दे देते हैं। वास्तव में यह एक संवेदनहीनता का ही नहीं सुपर एस्ट्रोलॉजी और चालाकी का प्रतीक है। ऐसे लोग समाज में अपने चारों तरफ धर्म और भ्रम की एक दीवाल खड़ा कर देते हैं जिससे कोई उनके असली रूप को जल्दी समझ ना पाए। जब तक कोई व्यक्ति सिर्फ अपने काम के समय ही विनम्र हो और बाकी समय में अनुपस्थित या अपेक्षा पूर्ण व्यवहार करें तो समझ लीजिए उसके इरादे शुद्ध नहीं हैं। ऐसे लोगों की असलियत सामने लाना उनके झूठे मुखोटे के उतारना समाज की जिम्मेदारी है। यह समझना आवश्यक है कि धर्म का अर्थ केवल पूजा पाठ नहीं बल्कि सत्य, करुणा, सेवा और निष्काम कर्तव्य है। जब समाज में संबंध सिर्फ उपयोग के लिए साधन बन जाए और रिश्ते सिर्फ लाभ के लिए समीकरण में तब्दील हो जाए तो यह संकेत है कि “मानवता खतरे” में है। लेकिन यह अभी अवसर है कि लोग जागरुक होकर ऐसे ढोंगी प्रवृत्ति से स्वयं दूर नहीं रख पाते क्योंकि उन्हीं लोगों के बल पर उन्हें धन कमाना होता है इसलिए उनके ढोंग को वह सत्य साबित करने के लिए झगड़ा करने तक के लिए तैयार हो जाते हैं। सच्चा इंसान वह नहीं है जो मंच से भाषण देता है बल्कि वह है जो बिना कहे अपने कर्तव्य निभाता है। इस स्वार्थी समय में यदि कोई सत्य और सेवा के मार्ग पर अधिक है तो वही समाज का असली दीपस्तंभ है। धर्म का दिखावा करने वालों से सावधान रहिए क्योंकि वे न केवल आपकी आस्था को चलते हैं बल्कि समाज की आत्मा को भी आहत करते हैं।

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