समाज का स्याह सच: जब स्वार्थ ने ली नैतिकता की जान

संत कबीर नगर
आज का सामाजिक परिवेश एक गहरे संकट से गुजर रहा है। स्वार्थ, लालच और व्यक्तिगत लाभ की दौड़ में हम सब इतने खो गए हैं कि नैतिकता और मानवता जैसे शब्द केवल किताबों में सिमट कर रह गए हैं। चारों ओर एक ऐसा माहौल बन गया है जहां सहयोगी भी शिकार बन जाते हैं और मित्र केवल स्वार्थ सिद्धि तक सीमित हो गए हैं। राजनीतिक नेताओं का गैर-जिम्मेदाराना रवैया भी इस स्थिति के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। वे केवल अपनी कुर्सी बचाने और सत्ता के खेल में इतने मशगूल हो गए हैं कि आम जनता की समस्याओं और जरूरतों से उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है। उत्तर प्रदेश की सरकार में भी कुछ ऐसे अधिकारी और कर्मचारी हैं जो सरकार को बदनाम करने पर तुले हुए हैं। उनकी कार्यशैली और रवैये से सरकार की छवि धूमिल हो रही है, लेकिन लगता है कि उन्हें इसकी कोई चिंता नहीं है। पर्यावरण की स्थिति भी बदतर होती जा रही है। विकास के नाम पर हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं और भविष्य की पीढ़ियों के लिए कुछ नहीं छोड़ रहे हैं। आपसी तालमेल और सहयोग की भावना खत्म होती जा रही है। लोग एक दूसरे के साथ स्वार्थ के रिश्ते बना रहे हैं और जैसे ही उनका स्वार्थ सिद्ध हो जाता है, रिश्ते खत्म हो जाते हैं। पैसे की दौड़ में लोग अनेक प्रकार के पाप कर रहे हैं। सहयोगी ही नहीं, मित्र और परिवार के सदस्य भी स्वार्थ के चक्कर में एक दूसरे का शिकार करने से नहीं हिचकिचाते। ऐसे लोग जो पहले आपका साथ देते हैं और आपकी प्रशंसा करते हैं, वही लोग आपके काम निकल जाने के बाद आपकी बुराई करने से नहीं चूकते।
इस स्याह सच को बदलने की जरूरत है। हमें अपने समाज को फिर से नैतिकता और मानवता के रास्ते पर लाने का प्रयास करना होगा। राजनीतिक नेताओं और सरकारी अधिकारियों को भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराना होगा और उन्हें जनहित में काम करने के लिए प्रेरित करना होगा। तभी हम एक स्वस्थ और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं। क्या हम इस दिशा में कदम बढ़ाएंगे या फिर स्वार्थ की इस दौड़ में और आगे बढ़ते जाएंगे? यह सवाल आज के परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका जवाब हमें खुद ढूंढना होगा।

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