आयुर्वेद: धनवंतरि की देन, भारत की अमूल्य धरोहर राघवेन्द्र त्रिपाठी

आयुर्वेद दिवस: सनातन चिकित्सा परंपरा को फिर से विश्वगुरु बनाने का संकल्प……………………………….

संत कबीर नगर
आज आयुर्वेद दिवस है—एक ऐसा दिन जो भारत की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसने चिकित्सा को केवल रोग निवारण नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण शैली माना। यह दिवस भगवान धनवंतरि के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें आयुर्वेद का जनक और देव वैद्य कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। वे केवल अमृत के वाहक नहीं, बल्कि अमृतमय चिकित्सा पद्धति,”आयुर्वेद”,के जनक भी माने जाते हैं। उनकी मूर्ति हाथ में जड़ी-बूटियों और अमृत कलश के साथ दर्शाई जाती है, जो संकेत देती है कि शरीर, मन और आत्मा की समग्र चिकित्सा ही वास्तविक आरोग्यता है। ‘आयुर्वेद’ का अर्थ है, “आयुः” (जीवन) + “वेद” (ज्ञान)। यह केवल औषधियों की विधि नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की संहिता है। इसमें आहार-विहार, ऋतुचर्या, दिनचर्या, पंचकर्म, धातु-स्तिथि, दोष-बैलेंस आदि हर पहलू को विज्ञानसंगत रूप से समझाया गया है। आयुर्वेद दिवस केवल परंपरा का उत्सव नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत के उसे आयाम का प्रतीक है जिसमें भारत अपनी जड़ों से जुड़कर संपूर्ण मानवता के लिए स्वास्थ्य का मार्गदर्शन कर सकता है। भगवान धन्वंतरि महाराज की यह अमूल्य धरोहर आज भी प्रासंगिक है। जहां पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली लक्षणों को दबाने पर केंद्रित होती है वहीं आयुर्वेद शरीर की प्रकृति, वाफ, कफ, पित्त के आधार पर मूल कारक का निदान करता है। आज I एम्स से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में आयुर्वेद की उपयोगिता को समझा जा रहा है एवं उनको अपने जीवन में शामिल किया जा रहा है जो भारत के लिए अत्यंत गौरव का विषय है, WHO ने भी आयुर्वेदिक पद्धत को वैश्विक स्वास्थ्य नीति में शामिल करने की पहल की है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आयुष मंत्रालय की स्थापना, आयुर्वेद विश्वविद्यालयों का विस्तार, अनुसंधान पर जोर और गांव-गांव तक हर्बल औषधीय के प्रचार में आयुर्वेद को पुनर्जीवित कर दिया है। आयुर्वेद से जुड़ी राष्ट्रीय औषधि योजना, आयुष्मान भारत योजना में आयुर्वेद की भागीदारी और जन औषधि केदो की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। करोना काल में जब विश्व आधुनिक चिकित्सा के विकल्प खोज रहा था तब आयुर्वेद काढ़े, हल्दी, गिलोय, अश्वगंधा और अन्य औषधि ने रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। एक बार फिर लोगों का विश्वास प्राचीन चिकित्सा की पद्धति की तरफ मुड़ चुका है। आज जब योग ने भारत को विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया है तब आयुर्वेद भी उसी राह पर अग्रसर है। दुनिया भर में आयुर्वेदिक रिसर्च सेंटर, पंचकर्म केंद्र, हर्बल ट्रीटमेंट की मांग बढ़ रही है। आयुर्वेद सिर्फ उपचार नहीं यह भारत की संस्कृति धार्मिक और आध्यात्मिकता की पहचान है।

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