शिक्षा सुधार के नाम पर थोपे गए कानून वापस लेने की मांग
बस्ती – कलवारी में छात्रों युवाओं और जागरूक नागरिकों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया है। प्रदर्शन में मौजूद छात्रों ने यूजीसी द्वारा थोपे गए इन कानूनों को शिक्षा सुधार के नाम पर छात्रों के भविष्य के साथ ‘खुला अन्याय’ बताया। इनका कहना है कि इन नियमों के कारण सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों में भय तनाव और असुरक्षा का वातावरण पैदा हो गया है। छात्रों ने कहा कि यह कानून उनके आत्मसम्मान मानसिक स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य पर सीधा प्रहार है। उन्होंने इस स्थिति को केवल शैक्षणिक समस्या नहीं बल्कि सामान्य वर्ग के बच्चों का गंभीर मानसिक उत्पीड़न बताया जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर नीति-निर्माताओं और प्रशासन पर आती है। इसके अतिरिक्त प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि यह कानून समाज में आपसी मतभेद को जानबूझकर बढ़ा रहा है और भाईचारे में गहरी खाई खोदने का काम कर रहा है। उनके अनुसार,शिक्षा जैसी व्यवस्था को जाति और वर्ग के आधार पर बांटना सामाजिक सौहार्द को नष्ट करने की दिशा में ले जा रहा है,जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है। छात्रों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसा ‘जनविरोधी और विभाजनकारी’ कानून किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा का उद्देश्य सभी को समान अवसर देना है न कि एक वर्ग को भयभीत कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करना। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से दृढ़तापूर्वक मांग की कि जनभावनाओं की अनदेखी न करते हुए इस विषय को तत्काल शासन एवं संबंधित उच्च अधिकारियों तक पहुंचाया जाए और यूजीसी द्वारा लाए गए इस कानून को अविलंब वापस लिया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि छात्रों की आवाज को अनसुना किया गया तो असंतोष और विरोध की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
