संत कबीर नगर
“बोली एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि। हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि॥ संत कबीर।
लेकिन संत कबीर नगर में तो ‘उल्टी बानी’ ही सरकारी भाषा बन चुकी है। लगता है जिला पूर्ति विभाग ने कबीर की उल्टी बानी को आत्मसात कर लिया है ,उल्टा बोला, उल्टा समझा, उल्टा किया और परिणामस्वरूप, जनता अब राशन कार्ड बनवाने के फेर में उलझ कर रह गई है। यह विभाग अब जनसेवा का नहीं, जनघमंड का केंद्र’ बन चुका है। आम आदमी जब अपने राशन कार्ड में किसी नाम, उम्र या मोबाइल नंबर की गलती ठीक करवाने विभागीय कार्यालय की चौखट पर जाता है, तो अधिकारी और बाबू वर्ग ऐसी भाषा में बात करते हैं, जैसे अर्जुन को चक्रव्यूह में फंसाकर निकलने का रास्ता भूल गए हों। राशन कार्ड सुधार,एक नाटक, कई पर्दे लेकिन कौन कहे और अगर कहीं लिख दिए तब तो फिर जो होना है वह भी नहीं होगा, सुधार के नाम पर त्रुटि यही विभागीय आदर्श वाक्य बन चुका है। कोई दस्तावेज़ अधूरा, तो कोई ‘पोर्टल बंद’ की बहाना बनाकर वापस लौटा दिया जाता है। बाबूजी कहेंगे “अरे भाई, सर्वर आज नहीं चल रहा। कल आइए।” दूसरे दिन जाओ, जवाब “आपका नाम तो आधार से मेल नहीं खा रहा है, पहले उसे सुधरवाइए।और जब आधार लेकर जाओ, तो कहेंगे “अब तो नया फॉर्म भरना पड़ेगा, ऑनलाइन आवेदन करना होगा, लेकिन सर्वर डाउन है।” यानि कि न पूछने पर भी ‘ज्ञान’ देंगे, और पूछने पर ‘तान’ देंगे। आम नागरिकों को गुनहगार के जिस रूप से, आम जनता को देखा जाता है वह भी किसी हद से व्यंग से कम नहीं है। अगर आपने एक बार भी पूछ लिया मेरा कार्ड कब सुधरेगा? तो बाबू की भौंहें है ऐसी चढ़ जाती हैं जैसे आपने कोई राजकीय गोपनीयता लीक कर दी हो। कुछ कर्मचारी तो राशन कार्ड को “गुप्त खजाना” समझते हैं। जब तक जनता जेब गर्म ना करें तब तक कोई भी नाम ऑनलाइन नहीं हो सकता, सर्वर डाउन। शायद बाबू लोग भूल गए हैं की जनता ग्राहक नहीं “अधिकारों का हकदार” है। कबीर जी के नाम में ही इतनी पवित्रता है कि उसका वर्णन करना मुश्किल हो जाता है, लेकिन अवसरशाही ने कबीर की आत्मा को भी दुविधा में डाल दिया होगा। कबीर कहते थे “सांच कहो सो मारन धाये”और आज यदि कोई नागरिक सच्चाई बोल दे तो सब यह काम रिश्वत के बिना नहीं होता, तब जवाब मिलेगा “बाबू को मत सिखाओ” कानून हम तुमसे ज्यादा जानते हैं। हमको बाबू गिरी सिखाओगे बिना पढ़े लिखे यहां चले आए हैं कानून सिखाने । जिला पूर्ति विभाग का यह रवैया केवल लापरवाही नहीं बल्कि एक सुनियोजित उदासीनता है। राजनीतिक संरक्षण के बिना ईतनी बेलगाम व्यवस्था नहीं चल सकती। अब जब चुनाव आते हैं तो जनता की चिंता होती है, बाकी समय राशन कार्ड से राशन तक की दूरी कोसों लंबी हो जाती है। इसलिए जनता को अपने अधिकारों के बारे में जानना चाहिए एवं संगठित होना चाहिए, और जिला पूर्ति विभाग को चाहिए कि वह अपने कर्तव्यों को आत्मसात करे, नहीं तो आने वाला वक्त सिर्फ लेखों और शिकायतों में बीतेगा और राशन कार्ड सरकार का केवल एक डिजिटल सपना बनकर रह जाएगा गरीब बेचारे कहां से इंतजाम करेंगे कुछ गरीबों के बारे में भी सोचिए बाबूजी। कृपया सरकार को बदनाम न करें सरकार ने हर सुविधा दे रखी है आम जनमानस को।
